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476 Views 2020-05-18 12:05:02

देव शयनी एकादशी 2020: चार महीने नहीं होंगे मांगलिक कार्य, चातुर्मास में रखें इन बातों का ध्यान

हिन्दू धर्म के पंचांग अनुसार पूरे वर्ष भर में 24 एकादशियाँ आती हैं जिसमें एक अधिक मास हो तो 26 एकादशी आती है। धार्मिक रूप से इन सभी एकादशियों का विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है। एकादशी का उपवास एक धार्मिक महत्व का भी माना गया है। इसे ही हरि शयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

देव शयनी एकादशी 2020 तिथि एवं समय

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

1 जुलाई 2020 ( बुधवार)

आषाढ़ी एकादशी पारणा मुहूर्त:

प्रात: 05:27:15 से 08:14:24 तक 2, जुलाई को

अवधि :2 घंटे 47 मिनट

देवशयनी एकादशी पूजा ( Devshayani Ekadashi pooja)

इस व्रत का संकल्प दशमी तिथि को ही ले लेना चाहिए इसलिए दशमी तिथि को ही भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अगले दिन प्रात: काल उठकर दैनिक कार्यों से निवृत हो जाएँ। भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन विराजित करवाकर उनका षोडशोपचार सहित पूजन करना चाहिए। पंचामृत से स्नान करवाकर, तत्पश्चात भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए।

आषाढ़ी एकादशी एवं चातुर्मास 2020 (चौमासा) – ( devshayani ekadashi and Chaturmas)

इस एकादशी से कुछ विशेष प्रकार के शुभ कार्य जैसे विवाह, मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस तिथि के बात भगवान विष्णु का शयन काल होता है। इसी दिन से चौमासे का आरंभ भी माना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु चार मास के लिए निद्रा में रहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान इन चार महीनों में ब्रज में निवास करते हैं इसलिए इन चार महीनों में यहाँ की तीर्थ यात्रा फलदायी मानी जाती है। दीपावली के बाद आने वाली एकादशी को भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं जिसे देव उठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कही जाती है।

चातुर्मास में इन बातों का ध्यान रखें

● गुड़, दही- भात का सेवन नहीं करना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार भी बारिश के मौसम में इन चीज़ों का सेवन हमारे लिए अस्वास्थ्यकर हो सकता है।

● लम्बी आयु प्राप्ति के लिए तेल का त्याग करें।

● शहद, मूली, परवल और बैंगन के सेवन को त्याग दें।

देवशयनी एकादशी के बाद से भगवान विष्णु शयन करने चले जाते हैं इसलिए कृषि को छोड़कर धार्मिक दृष्टि से किए जाने वाले सभी शुभ कार्यों, जैसे- विवाह, उपनयन, गृह-प्रवेश मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। साधु-संत भी एक स्थान पर रह कर साधना करते हैं जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इन चार महीनों में विशेष कार्यों के लिए विद्वान आचार्यों से सलाह के बाद ही कोई आवश्यक मांगलिक कार्य करने चाहिए।

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