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653 Views 2020-02-22 06:12:35

विक्रम सम्वत 2077: क्या होता है संवत्सर? क्या है विक्रम संवत के पीछे का इतिहास

नव वर्ष को नए उल्लास और जीवन रूप यात्रा में पुरानी बातों को समाप्त कर नए सिरे से प्रारम्भ करने के रूप में भी जाना जाता है। इस वर्ष अंग्रेजी नववर्ष 2020 की शुरुआत हुए जबकि मार्च में इसी वर्ष विक्रम संवत 2077 का भी प्रारंभ होने वाला है।

इस वर्ष 2020 में हिन्दू नववर्ष ( नव संवत्सर ) कब प्रारम्भ होगा?

अंग्रेजी कलेंडर के मुताबिक गणना की जाए तो 2020 में नए विक्रम संवत की शुरुआत 25 मार्च को होने जा रही है। हिन्दू धर्म मुहुर्तादी की गणनाएं इसी के अनुसार की जाती है। हालाँकि शालिवाहन सवंत ( शक संवत या शाके साल ) भी कई ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

2077 का नव संवत्सर ‘प्रमादी’ नाम से जाना जाएगा। प्रमादी नामक संवत के प्रभाव से कृषी के क्षेत्र में विकास देखने को मिल सकता है। अनाज उत्पादन में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है। रस से बने हुए पदार्थों के उत्पादन के साथ-साथ मूल्यों में भी बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है।

क्या है संवत्सर ?

संवत्सर को परिभाषित किया जाए तो यह एक तरह से लिए ऋतुओं के एक पूरे चक्र को समय के साथ परिभाषित करने को लेकर है। सामान्य रूप से और वैज्ञानिक रूप से माना जाता है कि सूर्य और पृथ्वी की स्थितियों से ऋतु चक्र प्रभावित होता है। वह मोटे तौर पर ऋतुओं के एक पूरे चक्र का लेखाजोखा है। हालाँकि कुछ वर्षों से हुए शोध में इन धारणा में अंतर आया है जिसके अनुसार ऋतुओं का निर्धारण सूर्य और पृथ्वी के अंतर्संबंध ही नहीं चंद्रमा, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि के अलावा आकाश में स्थित तारों के 27 समूह(नक्षत्र) के आधार पर भी होते हैं।

विक्रम संवत के प्रारम्भ होने का इतिहास :

लगभग तीस तरह के संवत प्राचीन भारतीय इतिहास में प्रचलन में थे जैसे शालिवाहन संवत, कृत संवत, मालव संवत इत्यादि। विक्रम संवत का प्रारम्भ राजा विक्रमादित्य के द्वारा प्रचलन में लाया गया जो कि माना जाता हैं जो 57 ई। पू। में प्रारंभ हुआ। इतिहास की दृष्टि में विक्रम संवत चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-413 ईस्वी) ने शुरू किया था। उससे पहले यही संवत मालव और कृत संवत के नाम से प्रयोग किया जाता है। चन्द्र गुप्त ने 95 शक राजाओं को हराकर पूरे भारत वर्ष में जितने भी लोग ऋणी थे उनका कर्ज स्वयं अपने कोष से भरा था। इसके पश्वात उन्हें विक्रमादित्य की उपाधि से भी नवाजा गया और एक नए संवत, विक्रम सम्वत का प्रारम्भ किया गया।

हालाँकि चन्द्र गुप्त द्वितीय के कालखंड और विक्रम सम्वत के प्रारम्भ होने में अंतर होने के कारण यह चन्द्र गुप्त के द्वारा ही प्रारम्भ किया गया है ऐसा पूरी तरह से प्रमाणित नहीं हो पाता है।

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